सपने



बचपन में कोई सपना नहीं था, बस खाना और अपने आप में मस्त हो जाना। समय के साथ उम्र बढ़ी और आंखों ने सपने देखने शुरू कर दिए। जैसे—जैसे आयु बढ़ी वैसे ही जिम्मेदारी भी बढ़ने लगी और साथ में सपने तो चल ही रहे हैं— खुद के सपने, माता—पिता के सपने और अपनों के सपने। 

पहले जो मेरे सपने थे वह छोटे छोटे हुआ करते थे, कॉमिक्स और कहानियां पढ़ना। ज्यादा हुआ तो कोर्स की किताबों तक बात पहुंच जाती थी और वे सपने जल्दी पूरे भी हो जाते थे। लेकिन समय के साथ समाज, परिवेश और दुनिया में हुए कुछ ईवेन्ट्स ने भी कुछ सिखा दिया और फिर एक सुरक्षित भविष्य बनाना भी सपनों की लिस्ट में शामिल हो गया है। सपनों की सूची यहीं समाप्त नहीं हुई, वह लगातार बढ़ती रही है और शायद बढ़ती भी रहेगी। लेकिन समझ में नहीं आता है कि किसके सपने को प्राथमिकता दी जाए, खुद के सपने को या मां—बाप के या फिर अपनों के सपनों को। जिन्दगी बहुत छोटी है और मैं इनमें से किसी के सपने को अधूरा नहीं छोड़ना चाहता हूं चाहे मेरा सपना हो या मेरे अपनों का। 

अब तो हम जिन्दगी के उस चरण में प्रवेश करने जा रहे हैं जहां पर हमें इन सपनों के साथ साथ उस बन्दे के सपनों के बारे में भी सोचना होगा, जो अपनी सारी दुनिया और खुशियां छोड़कर हमारे पास आया है। पता नहीं, जिन्दगी के इन सपनों को पूरा करने का कौन सा रास्ता चुनना पड़ेगा। रास्ता चाहे जो भी चुनना पड़े पर मैं इनमें से किसी के सपने को इग्नोर नहीं करना चाहता, क्योंकि सपने हों या अपने, इनमें से मैं किसी को नहीं भूल सकता।
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