जीवन में 18—25 वर्ष की आयु वह महत्वपूर्ण पड़ाव होता है जब हमें अपने जीवन का सही रास्ता चुनना होता है। ये वक्त ऐसा होता है जब हमारे सामने कई सपने और कई लक्ष्य होते हैं। सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि हम इनमें से किसी को छोड़ना नहीं चाहते हैं। न तो हम अपने ड्रीम्स से समझौता करना चाहते हैं और न ही हम अपने लक्ष्यों को भुलाना चाहते हैं। जमीन—आसमान की तरह एक दूसरे के विपरीत होने पर भी हम कोशिश करते हैं कि हम दोनों को एक साथ पा सकें। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिनको दोनों चीजें एक साथ मिल जाएं।
दूसरों का तो पता नहीं पर हमने हर पल खुद को भटकाना चाहा है ताकि हमारे दिल में प्यार, अपनेपन या लगाव जैसी कोई फीलिंग्स ही न जाग सके। इसके लिए हमने हर पल अपने आपको अकेला और एक काल्पनिक दुनिया में बनाए रखा। एक लंबी अवधि तक ऐसा करते रहे तो धीरे—धीरे यही हमारी आदत बन गयी। अब हमें अकेलापन नहीं लगता बल्कि हमें इसी की आदत हो गयी है। आज आलम यह है कि हमें किसी की याद नहीं आती। जो लोग हमसे बात करते हैं उनसे हम बात करते रहते हैं लेकिन जो हमें याद नहीं करते, उनके बारे में हमारे दिमाग में कोई याद तक नहीं रहती है।
अब लोग हमें बेदिल कहें या स्वार्थी। लेकिन सच यही है कि 11 वर्ष की लंबी समयावधि तक अकेले बने रहने से हमें अकेलेपन की ही आदत हो गयी है। न तो हमें अब किसी से लगाव होता है और न ही किसी से नफरत।

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