संस्कारहीन (Part-01)


शर्मा जी के मकान से चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं, ऐसा लगता था कि शर्मा जी का पारा सांतवें आसमान पर पहुंच गया हो। उनका एकमात्र इकलौता लड़का सिर झुकाए डांट सुनता जा रहा था। सिर क्यों न झुकाता, उसने काम ही ऐसा किया था। काफी देर सुनने के बाद मुझे इतना समझ आ गया कि शर्मा जी आखिर अपने इकलौते और चहेते राहुल पर क्यों चिल्ला रहे थे। हुआ ये था कि राहुल ने .....

शर्मा जी का पूरा नाम देव नारायण शर्मा था. सबसे सरल और सुलभ होने के कारण उन्हें शर्मा जी के नाम से जाना जाने लगा था। उनकी जिन्दगी की गाड़ी बड़ी बेहतर गति से चल रही थी। एक बेटी थी जिसकी शादी वह कर चुके थे और दूसरा उनका प्यारा राहुल था जिसे वह जान से भी ज्यादा चाहते थे। वह कॉलेज में पढ़ रहा था। हालांकि संपत्ति कुछ ज्यादा न थी पर जो मिला था उसी में उनको संतोष था और सबसे बड़ा संतोष यह था कि उनके दोनों बच्चे अच्छे संस्कारों से परिपूर्ण थे और यही शर्मा जी की सबसे बड़ी दौलत थी।
शर्मा जी एक छोटे से कस्बे में रहते थे जहां पर कॉलेज की पढ़ाई ठीक से संभव नहीं थी इसलिए उन्होंने अपने दिल को समझा—बुझाकर राहुल को खुद की नजरों से दूर पास के शहर में भिजवा दिया था। हालांकि राहुल अपने घर—परिवार से दूर था लेकिन शर्मा जी को अपनी परवरिश पर पूरा भरोसा था कि उनका राहुल ऐसा वैसा कुछ नहीं करेगा कि उनको समाज में सर झुकाना पड़े। राहुल भी अपने पिता के मान और परिवार की प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए वचनबद्ध था।
आज के समाज में अगर कोई बच्चा परिवार की नजरों से दूर शहर में आ जाए तो शहर की चकाचौंध उसे बदल दिग्भ्रमित कर ही देती है लेकिन यह शर्मा जी की परवरिश का ही नजीता था कि 01 साल पूर्ण होने पर भी राहुल अपने सिद्धांत और संस्कारों पर अड़ा हुआ था। घर से कॉलेज, कॉलेज से घर और फिर कोचिंग जाना और वापिस आकर अपनी दुनिया में मगशूल हो जाना ही उसकी आदत थी। उसके आसपास क्या हो रहा है, यह न तो कभी राहुल ने जानने की कोशिश की और न ही ऐसा कोई उसे मिला था जो उसे खुद के अलावा किसी और के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर सके।
ऐसा नहीं था कि शर्मा जी ने अपने बच्चों को डरपोक बनाया हो या उनमें घर—घुसरी प्रवृत्ति का विकास किया हो। शर्मा जी ने तो अपने दोनों ही बच्चों को बचपन से ही महान और अच्छे आदर्शों की कहानियों को पढ़ाया था, दूसरों की मदद करना और परोपकार के लिए स्वयं को न्यौछावर कर देना ऐसे सिद्धांत अपने बच्चों में विकसित किए थे। और यह सब संस्कार उनके बच्चों में परिलक्षित भी होते थे। शर्मा जी उस समय अपने आपको बहुत गर्वित महसूस करते थे जब लोग उनके बच्चों के बारे में बताते थे और उनकी भूरि—भूरि प्रशंसा करते थे।
जब तक सोनी की शादी नहीं हुई थी तब तक राहुल और सोनी दोनों एक दूसरे से बातचीत करते और अपनी दुनिया में मस्त रहते थे। दोनों भाई बहन एक ही विचाराधारा के थे - अपने काम से काम रखना। इसी वजह से उनका बाहरी दुनिया से कोई वास्ता नहीं था। जब उसकी दीदी की शादी हो गयी और वह राहुल से दूर चली गयीं, तब राहुल अकेला रह गया।​ फिर भी उसने किसी और को अपनी दुनिया में जगह नहीं दी थी। वजह यह थी कि उसके सपने और फीलिंग्स कुछ ऐसे थे कि उनको समझना हर किसी के वश की बात नहीं थी। उसका दिल न ​दुखे या किसी बेवजह के पचड़े में फंसना न पड़े इसलिए राहुल ने अपने आपको खुद की बनायी हुई एक दुनिया में कैद कर लिया था।

शहर में कॉलेज की पढ़ाई करते राहुल को लगभग एक साल हो गया था पर वह सारी दुनिया से बेखबर अपनी दुनिया में मस्त रहता था। शुरूआत में कुछ लोगों ने उससे जुड़ने की कोशिश की थी पर उसकी बेरूखी ने उन्हें जवाब दे दिया था कि उसे किसी की जरूरत नहीं है, वह अपने आप में खुश है। राहुल ने कॉलेज के नोटिस बोर्ड और ब्लैकबोर्ड के अलावा किसी चीज को नोटिस नहीं किया था पर कोई था जो राहुल को नोटिस कर रहा था और उसे पूरा विश्वास था कि एक दिन राहुल उसे भी नोटिस करेगा। 

....... क्रमश: 


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