चेहरा और चरित्र


हमारे समाज की आम धारणा है कि वह सब्‍जी-फल की भांति इंसान के चेहरे से उसके चरित्र का अनुमान लगाया जा सकता है। लेकिन यह बिल्‍कुल गलत है क्‍योंकि चेहरा और चरित्र बिल्‍कुल विपरीत होते हैं। दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जिनका चेहरा भले ही आकर्षक न हो लेकिन उनके कार्य और पहचान की दुनिया कायल होती है। 

यह सत्‍य भली भांति जानने के बावजूद भी हम अक्‍सर चेहरे पर ही मरते हैं। बात मित्रता की हो या शादी संबंध की, हम सबसे पहले उसका चेहरा और वेषभूषा देखते हैं। अगर हमें वह आकर्षक नहीं लगता है तो हम उसे उतना महत्‍व नहीं देते जितना कि दिया जाना चाहिए। जबकि हम अच्‍छी तरह से जानते हैं कि जिनका चेहरा आकर्षक है जरूरी नहीं कि उनका कार्य और चरित्र भी उतना ही चमकदार हो, फिर भी न जाने क्‍यों हम चमक पर ही मरते हैं। हर जगह हम ऐसे चेहरे की तलाश करते हैं जो हमें आकर्षक लगे। 

मैंने कई लोगों को देखा है जो फेसबुक पर एक अच्‍छी फोटो वाली प्रोफाइल को तलाशते रहते हैं और जैसे ही दो-चार चमकदार फोटो उनको दिखती हैं, वे तत्‍काल उसे फ्रेण्‍ड रिक्‍वेस्‍ट भेज देते हैं। बाद में साम-दाम-दण्‍ड और भेद चारों प्रकार की नीति अपनाकर उसका असली चेहरा देखने की कोशिश करते हैं। हंसी तो तब आती है जब काफी मेहनत के बाद उनको उस प्राेफाइलधारी का असली चेहरा दिखता है जो उनकी आशा के पूर्णत: विपरीत होकर उनको निराशा प्रदान करता है। तब वे उस इंसान से ऐसे दूर भागते हैं जैसे कोई गंदगी को देखकर नाक-भौं सिकोड़कर भागता है। 

यह तो बात रही सोशल मीडिया की। अब अगर हम अपने समाज में देखें तो हर इंसान एक बेकार से चेहरे को देखकर यही अनुमान लगाता है कि सामने वाला बन्‍दा एक बेकार, अशिक्षित और चोर-उचक्‍का है। हम सच जाने बिना ही उसके चेहरे को देखकर यह मानसिक धारणा बना लेते हैं कि जैसी इसकी शक्‍ल है, वैसी ही इसकी अक्‍ल होगी, जबकि वास्‍तविकता में ऐसा नहीं होता। सच जानते हुए भी हर इंसान केवल चेहरे को देखकर योग्‍यता का अनुमान लगाता है और यही कारण है कि यहां पर मक्‍कार लोग क्रीम पाउडर लगाकर, सज्‍जन बनकर घूमते हैं और जो दिन भर मेहनत करके शाम को लौटते हैं वे समाज को एक आवारा, अशिक्षित, मनहूस और बेकार से मालूम पड़ते हैं। 

चेहरा प्रकृति का तोहफा है पर योग्‍यता इंसान की मेहनत का फल है। हर किसी के पास वक्‍त सीमित है कुछ लोग उसी वक्‍त में अपना चेहरा चमकाते हैं और कुछ लोग अपने चेहरे के बजाय अपनी योग्‍यता विकसित करते हैं। उन्‍हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके बेकार चेहरे के कारण समाज उनको किस नजरिए से देखता है, वे तो बस अपने कार्य में मग्‍न रहकर अपनी तकदीर चमकाने का प्रयास करते हैं। 
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