आप किसी भी धर्म-शास्त्र को उठाकर देख लीजिए, विधाता ने हर स्वरूप में कुछ न कुछ शिक्षा अवश्य दी है हमें उन शिक्षाओं का ही पालन और अनुसरण करना है, इससे हम स्वत: ही विधाता के निकट पहुंच जाएंगे। केवल पूजा अर्चना करना ही सब कुछ नहीं होता है, उन चीज को भी फॉलो करना जरूरी है जो कि भगवान को वास्तविक तौर पर हमारे लिए मेहरबान करें।
एक छोटा सा उदाहरण देता हूं। हम हर रोज रामायण, महाभारत और गीता का पठन करते हैं और एक निश्चित समय उपरांत उनको भुला देते हैं। भगवान ये नहीं कहते कि आप उनकी गाथा को रोज पढ़ें बल्कि उनका संदेश यह होता है कि जिस प्रकार से हमने धर्म की रक्षा में सब कुछ त्याग दिया ठीक उसी प्रकार सत्य और धर्म को बचाए रखने के लिए आप भी त्याग कीजिए। जबकि वास्तविकता में ऐसा हम नहीं करते केवल रामायण पढ़ी और बन्द करके उनके उपदेश गाने लगते हैं। जब सत्य और धर्म की बात आती है तो हम कहते हैं कि इस युग में अगर सच्चे बनकर रहे तो लोग जीने नहीं देंगे।
त्रेतायुग में भगवान राम को वनवास हुआ था पर उनके भाई उनके लिए सब कुछ न्यौछावर कर गए, और भाई प्रेम का संदेश दिया। भगवान ने धर्म की रक्षार्थ अपनी पत्नी, अपने सुख एवं सर्वस्व का त्याग कर दिया और वीर हनुमान ने तो अपना सर्वस्व भुलाकर निस्वार्थ भाव से सेवक का धर्म निभाया। और हम इन सब चीजों को हर रोज देखकर केवल भुला देते हैं एक दिन भी हम रामायण के किसी पात्र का अनुसरण नहीं करते हैं। और जब हम पर थोड़ा सा भी दुख आता है तो हम लग जाते हैं भगवान को कोसने के लिए। आप ही सोचिए, क्या हम भगवान के सही भक्त या अनुसरणकर्ता हैं ?
कुछ लोग समझते हैं कि उन्होंने 108 बार हनुमान चालीसा, या 108 कन्याओं का भोज करा दिया, उन्होंने भगवान पर 3 घंटे चढ़ा दिए, एक मंदिर बनवा दिया, इसलिए हम सबसे अच्छे भक्त हैं और आस्तिक हैं। जो पूजा नहीं करते, धर्मकाण्ड नहीं करते वे मूर्ख और दुष्ट हैं। भगवान ने ही तो आपकी और हमारी इस दुनिया को बनाया है, हम उनको क्या दे सकते हैं। प्रसाद, भण्डारा और तीन घंटे या किसी की बलि,........ ये सब नहीं चाहिए उनको। उनको ऐसे अनुसरणकर्ता चाहिए जो उनकी धर्म ध्वजा को थामे रह सकें। सत्य और धर्म की खातिर सर्वस्व समर्पित करने वाले अनुसरणकर्ता ही आज भगवान के सच्चे भक्त हैं, चाहे वे कभी उनके दरवार में जाएं या न जाएं।
अगर वास्तव में उनको प्रसन्न करना है तो उनके संदेश को समझिए, उसको पूरा करने की कोशिश कीजिए।
