किताबों ने और बड़े बुजुर्गों ने बचपन से न जाने क्या—क्या सिखाया था पर यहां पर तो सब विपरीत ही दिखता है। दूसरों की बात तो दूर, मेरे साथ वाले ही मुझे देखकर मन ही मन न जाने क्या क्या सोचते रहते हैं। लोगों की सोच क्या है पता नहीं पर मैं उनके हिसाब से खुद को बदल नहीं पाता हूं इसलिए अपने आप में ही मस्त रहता हूं। मेरी सादगी और व्यवहार को देखकर लोग भले ही कुछ सोचते हों पर मैं हमेशा से ऐसा ही रहता हूं क्योंकि यह सब मेरे खून में घुल चुका है। लोग बड़ी आसानी से किसी के पीठ पीछे अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं लेकिन मुझसे यह सब होना तो दूर की बात, मैं उस बारे में सोचते ही न जाने किन—किन ख्यालों से गुजरता हूं और कई घंटे तक यही विचार नहीं कर पाता कि आखिर सही क्या है ? पुलिस डिपार्टमेंट में 01 साल से अधिक हो गया है पर न जाने कब मैं पुलिस जैसा बन सकूंगा।
लोगों से और उनके कटाक्ष से बचने के लिए मैं अपने आप में मस्त रहा, खामोश रहा तो लोगों ने एक मतलब निकाला और न जाने क्या क्या कहने लगे। खामोशी का साइट इफेक्ट देखकर, मैंने जब कुछ बोला तो लोगों ने फिर एक नया मतलब निकाला और फिर मैं नर्वस हो गया। समझ नहीं आता कि लोग इतना मतलब कैसे निकाल लेते हैं। कभी पॉजीटिव सोच इनके दिमाग में आती ही नहीं, बस हर पल उल्टा—सीधा सोचते रहते हैं। इन सब परिस्थितियों के हिसाब से अभी हाल फिलहाल तो मैं खुद को एडजस्ट नहीं कर सकता और न ही अभी दिल यह तय कर पाया है कि सही और गलत क्या है इसलिए अब मैं खामोश ही रहूंगा। खामोशी से लोग मतलब भले ही निकालें पर कम से कम किसी से बुराई तो नहीं होगी।
