''कल फेसबुक पर मैंने एक वीडियो देखी, जिसमें बताया जा रहा था कि दूधिया किस प्रकार से दूध में मिलावट करते हैं। 05 मिनट की उस वीडियो में कम से कम उन दूधियों को 50 हजार गालियां दी गयी थीं। कहा जा रहा था कि इन लोगों को केवल अपने स्वार्थ की चिंता है, अपनी जेब गरम करने की चिंता है बाकी लोग मरें या जिएं, इनको कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे लोगों को जीने का कोई हक नहीं है, ये लोग समाज के हत्यारे हैं। न जाने कितने मासूम लोगों को इन्होंने जहर पिलाया है।'' उस वीडियो में और भी बहुत कुछ कहा गया था पर लिखते—लिखते काफी शब्द हो जाएंगे इसलिए इतना ही कहना चाहता हूं कि उस 05 मिनट की वीडियो में वीडियो बनाने वाले ने अपनी पूरी खुन्नस निकाल दी थी।
वीडियो देखकर, कुछ देर के लिए दिल में गुस्सा तो आया कि आखिर ये लोग ऐसा क्यों करते हैं पर जब बाकी लोगों की एक्टिविटी पर ध्यान दिया तो पता चला कि केवल दूधवाले ही नहीं, इस देश में चपरासी से लेकर बड़े से बड़े लोग भी अपनी अपनी औकात के हिसाब से घोटाले करते हैं। चाय वाला चाय में चीनी कम डालता है या दूध कम डालता है या अन्य कोई बात। कुल मिलाकर बात यह है कि वह अपनी क्षमतानुसार जो घोटाला कर सकता है, कर लेता है। ठीक ऐसा ही बाकी सब का है। एक सफाई करने वाला सोचता है कि कौन सा आज प्रधानमंत्री आ रहे हैं जो दिल लगाकर साफ करूं और वह भी अपनी क्षमतानुसार घोटाला कर लेता है। एक डॉक्टर सोचता है कि बीमार मरीज जाएगा कहां, दबा लेते हैं साले को। वह भी अपनी योग्यतानुसार उससे पैसे ऐंठ लेता है।
लोग पुलिस से उम्मीद करते हैं कि वह 24 घंटे जागकर लोगों की हिफाजत करे लेकिन यह कोई नहीं देखता कि डॉक्टर का एक गरीब पड़ोसी दर्द से तड़पकर मर गया। लोग यह नहीं देखते कि हर गली में टीचर होने के बावजूद भी आज हमारे बच्चे अंगूठाटेक बने घूम रहे हैं। कोई यह भी नहीं देखता कि हर गांव, हर गली में एक राजनेता होने के बाद भी उस गली—गांव का विकास नहीं हो रहा है। और तो और कभी यह नहीं देखते कि एक आम इंसान ने बेवजह ही सार्वजनिक चीज को तोड़ दिया, किसी मालगाड़ी से सामान चुरा लिया। सच बात तो यह है कि इनमें से बहुत से काम तो हम आप स्वयं ही करते होंगे पर फर्क इस बात का है कि हमें अपनी गलती बाल के बराबर भी नहीं लगती और दूसरों की गलती पर हम बबाल खड़ा कर देते हैं।
कहते—कहते मेरे लफ्ज कम पड़ जाएंगे पर लोगों की गतिविधियों को नहीं गिना पाउंगा। मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं कि आज की इस दुनिया में किसी भी गलती के लिए कोई एक इंसान जिम्मेदार नहीं है हम सब बराबर के दोषी हैं। क्या एक मां—बाप का फर्ज नहीं बनता कि वह अपने बच्चों को लाड़ प्यार में न बिगाड़कर इस समाज को एक सभ्य और अनुशासनित बालक दें ? क्या टीचर्स अपना फर्ज निभाते हैं बालकों को पूरा और समुचित ज्ञान देकर ? और क्या बड़े होने पर हम लोगों ने अपने नैतिक कर्तव्यों को पूरा करने की कोशिश की ? सच पूछा जाए तो नहीं की, क्योंकि हमारी आदत बन गयी है — जो हम करें वह सही और जो दूसरे करें वह गलत। आज हम अधिकार तो चाहते हैं पर अपने दायित्व नहीं निभाना चाहते हैं।
हम सब घोटालेबाज हैं और अपनी—अपनी औकात के हिसाब से घोटाले करते हैं। वह तो शुक्र है उन देश के जवानों का जिन्होंने हमेशा से अपने दायित्वों को निभाया है। आज एक वही तो हैं तो हमेशा कर्तव्य निभाते हैं और कभी अधिकार की बात नहीं करते, न ही किसी के घोटालों पर हंगामा करते हैं। वह भले ही सैनिक हैं , पर देखा जाए तो इस देश के असली नागरिक तो वहीं हैं क्योंकि वही अनुशासित हैं, वही कर्तव्यनिष्ठ हैं और वही इस देश के रक्षक। हम उम्मीद करते हैं कि हमें एक अच्छा समाज, एक अच्छा जहां मिले पर हम कभी यह कोशिश नहीं करते कि हम एक अच्छा समाज बनाएं। हम अपने लाड़ प्यार में बच्चे को ही इतना बिगाड़ देते हैं कि समाज तो दूर हम एक अच्छा और संस्कारी बच्चा तक नहीं बना पाते।
सार्वभौमिक सत्य यही है कि यह समाज किसी एक बन्दे से नहीं बना है और न ही कोई एक बन्दा इसकी इस हालत का जिम्मेदार है। सही और गलत के लिए हम बराबर के भागीदार होते हैं बस हम उसे स्वीकार नहीं करना चाहते और अगर कर भी लें तो उसे बदलने की हममें हिम्मत नहीं होती। आज जरूरत इस बात की है कि हमें खुद को बदलना होगा, हमारी सोच को बदलना होगा। आज हम दूसरों से अच्छे की अपेक्षा रखते हैं तो हमें भी अच्छा बनना होगा। अगर हमें संवैधानिक अधिकार चाहिए तो हमें उन कर्तव्यों को भी पूरा करना होगा जो संविधान में हमारे लिए निर्धारित किए गए हैं तभी हम यह कह सकेंगे कि उसने गलत किया है।
