आप कल्पना कीजिए कि यदि सातों रंग आपस में मिल जाएं तो क्या वे बेहतर दिखेंगे ? नहीं, न .... ठीक इसी प्रकार से इस दुनिया में जाति—धर्म या संप्रदायों का अस्तित्व है। हर जाति, हर धर्म के अपने अपने सिद्धांत होते हैं। और लोग उन्हें मानने की पूरी कोशिश भी करते हैं।
'सिद्धांत' यह कोई प्राकृतिक चीज नहीं है बल्कि हम आप जैसे इंसानों द्वारा ही बनाए गए होते हैं। सच कहा जाए तो सिद्धांत किसी एक इंसान द्वारा ही स्वयं के लिए बनाए गए होते हैं और जब कोई उनसे प्रभावित होता है जो उनका अनुसरण करने लगता है और धीरे—धीरे यही अनुसरणकर्ता अनुयायी बन जाते हैं और सिद्धांत धर्म का स्वरूप धारण कर लेता है। देखा जाए तो सिद्धांत एक अच्छे जीवन, अच्छे कल की संकल्पना को लेकर बनाए जाते हैं लेकिन आज हालत यह है कि सिद्धांतों और धर्म की आड़ लेकर लोग मारकाट करने पर उतारू हैं।
सिद्धांत हों या जाति—धर्म, ये सब हमने इसलिए बनाए ताकि हमारा समाज, हमारी दुनिया सतरंगी लगे पर इसका मतलब यह तो बिल्कुल नहीं निकालना चाहिए कि एक जाति/धर्म के लोग दूसरे लोगों से नफरत करें, उनके प्रति विद्वेष की भावना रखें या उनके समूल नाश की तरफ अग्रसर होते रहें। सातों रंग अलग—अलग शोभा देते हैं पर उनका अलग होना सजा नहीं है न ही यह उनके बीच लड़ाई का आधार होता है। वो तो इसलिए अलग हैं ताकि वे सब मिलकर एक आकर्षक और सुन्दर जहां का निर्माण कर सकें।
